inspiration, philosophy, poetry

इतिहास

इतिहास ये –
गेरुआ सा,
धुँधला सा,
घटता हुआ |
ईमारतें टूटी फूटी सी,
दीवारें भी दरारों भरी,
धरोहर फिर भी मज़बूत,
स्तम्भ ये अडिग खड़े हुए \
पत्थरों पर जमी वक़्त की काई,
ज़मीन पर पनपती प्रकृति,
ये संतुलित सा आकार,
ना अब तक बंजर हुआ,
ना ही बसेरा बना |
प्रदीप्ति

दर्शन, inspiration, philosophy, poetry

सन्देश

© tulipbrook @Kanhan Maharashtra

बादल के लिफ़ाफ़े में छुपाकर,

आज रोशनी भेजी है,

इस सूने तन्हा आसमान ने |

और डाकिया बनी है,

मदमस्त सी ये फ़िज़ा,

ताकि मीलों के ये फ़ासले,

आसानी से तय हो सके,

मगर शुल्क लगाया इस मौसम ने,

कुछ हिस्सेदारी अपनी भी माँगी,

ले ली कुछ किरणें फिर,

और बाकी वहीं रहने दी |

इस प्यारी सी सौगात की,

अभिग्राही बनी है ये धरा,

जो इस सन्देश को पाकर,

प्रज्वलित हो उठी,

स्वर्णिम सी हया लिए |

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वक़्त

वक़्त पानी सा बहता गया,
जीवन की नाव चलती गयी,
कई छोर छूटते गए,
किनारे भी धुंदले होते गए,
और अब ये मंज़र है,
कि गहराई रास आने लगी है,
अब ना किसी छोर की तमन्ना,
ना ही किसी किनारे की आस बची है |

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समय

Image Source – internet

समय की गाड़ी चलती रही,
पलों के कई डब्बे लिए,
मुलाक़ातों के स्टेशन आते रहे,
सफ़र ये जीवन का,
यूँही बस चलता रहा |
अब गाड़ी तो चली गई,
डब्बो को अपने संग लिए,
स्टेशन भी अब छूट गए,
बस अब यादों की ये पथरियाँ बाकी हैं |

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जीवंत

इस अंतारंग के संताप को,इस कदर घोला तुमने,अपने महासागर रुपी प्रेम में,जैसे घुलती हो ये जमी उंगलियाँ,इन ऊन के धागों से बुने दस्तानों में,जो सौम्य सा सौहार्द देते हैं,दिसंबर की ठिठुरती ठंड में |और यूँ बेपरवाह सी जीती हूँ मैं अब,ना सूरज के उगने की चिंता होती है,ना ही कलियों के खिलने की चाह |
अब तो आभास होता है,एक क्रान्ति सा परिवर्तन का,इस अंतर्मन में,जिसे सदियों से जकड़ रखा था,कई दानावों ने,जो कुचलते रहे सोच को,छीनते रहे शान्ति,औरमेरे काल्पनिक उल्लास को भी |आज,आखिरकर,मैं उन्मुक्त हूँ,निरंकुश और श्वसन,हाँ!आख़िरकार,मैं सही मायने में जीवंत हूँ |

दर्शन, inspiration, philosophy, Soulful

ग़म

यूँ तो ज़िन्दगी में,

हर जज़्बात मौजूद है,

मगर ग़म की बात करें तो,

कोई रहकर देता है,

कोई जाकर,

कोई कहकर दे जाता है,

कोई चुप रहकर,

कोई यकीन के नक़ाब में,

कोई फ़रेब के खुलासे में,

कोई झूठ के लिबास में,

कोई सच के एहसास में,

कोई करीबी होकर,

कोई दूरी बनाकर,

कोई प्यार करके,

कोई वार करके,

कोई अपना बनके,

कोई अनजाना बनके,

कोई क्षण भर ही,

कोई ताउम्र तक,

ये ग़म दे जाता है |

वो ग़म फिर,

कभी बहता है,

इन अश्कों से,

किसी सैलाब की तरह,

कभी भड़कता है,

इन नैनों में,

किसी लावा की तरह,

कभी गरजता है,

इन लबों से,

किसी तूफ़ानी बादल की तरह,

कभी ठहरता है,

इस ललाट पर,

किसी गहरी निशा की तरह,

कभी चुभता है,

इस देह में,

किसी रेगिस्तानी शूल की तरह,

कभी नज़र आता है,

एक प्रचण्ड अस्तित्व सा,

कभी ओझल हो जाता है,

किसी साये की तरह |

ग़म : ज़िन्दगी : जज़्बात

दर्शन, inspiration, philosophy

क्या?

क्या पँखुड़ी फूल से जुदा है?क्या कली को अपना कल पता है?क्या बहार पतझड़ से डरती है?क्या बंजर ज़मीन फूटने से कतरती है?क्या नदी ठहरना चाहती है?क्या सागर बहना को तरसता है?क्या आकाश सूर्य से रंग चुराता है?क्या सूर्य बादलों पे प्यार जताता है?क्या चाँद रोज़ बेनक़ाब होना चाहता है?क्या सूरज कुछ दिन विश्राम करना चाहता है?क्या हवा अपनी गति की मोहताज होती है?क्या बारिश की बूँदों में भी प्यास होती है?क्या रात को दिन से ईर्ष्या होती है?क्या शाम को अपने अस्तित्व की चिंता होती है?क्या फूलों को अपनी महक पे अभिमान होता है?क्या पर्वत को अपनी विशालता पे गर्व होता है?क्या सूखे फूलों को फिर से खिलने की इच्छा होता है?क्या टूटी लहरें फिर से उभरना चाहती हैं?क्या सुलगता लावा भी ठंडकता चाहता है?क्या बर्फ़ की चादर भी गर्माहट चाहती है?क्या कोयला हर बार हीरा बन पाता है?क्या टूटा कॉंच फिर से जुड़ पाता है?क्या दर्द को दवा की ज़रूरत होती है?क्या दुआ हर बार पुरी होती है?क्या ये उदासी इतनी ज़रूरी होती है?क्या ये ख़ुशी एक मजबूरी होती है?क्या ये अश्क़ कमज़ोरी होते हैं?क्या ये प्रेम यूँही सदैव रहता है?क्या एक दूजे से मिलना तय होता है?क्या ये रिश्ते अकेलेपन से कीमती हैं ?क्या ये अपने गैरों से क़रीब होते हैं?क्या पहचान अनजान होना चाहती है?क्या अनजान हमेशा के लिए जुड़ना चाहते हैं?क्या खोना जीवन का दस्तूर होता है?क्या पाना हमेशा स्वार्थ होता है?क्या है और क्या नहीं?क्यूँ है और क्यूँ नहीं?कब है और कब नहीं?इसका तो पता नहीं,मगर,ये सवाल यूँही उठते रहेंगे,कुछ का जवाब मिल जाएगा,कुछ यूँही रहस्य बनके रहेंगे |

क्या : रहस्य : सवाल

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चौखट

चौखट
परते उतरती हर कोने की,

साथ में गिरते उनके झर झर,

हल्दी कुमकुम के सूखे कण,

रोशन करता इन टूटी दरारों को,

एक छोटा सा मिट्टी का दिया,

सजता हर सुबह ये,

पीले नारंगी गेंदों की माला से,

और बँधती आम्र पत्रों की डोर,

इसके दोनों सिरों से,

धुलता ये गेरुआ फर्श भी,

बनती रोज़ इसके सामने,

रंगोली चावल की,

गुज़रते इससे दिन में कई बार,

घर के बूढ़े बच्चे सभी,

कोई खिलखिलाता,

कोई मुस्कुराता,

कोई माथे पे शिकन लिए,

कोई दिल में बोझ,

कोई पुरानी यादें लिए,

कोई अधूरी इच्छायें लिए,

कोई दर्द छिपाये हुए,

कोई क्रोध दिखाते हुए |

देखी है इसने,

ख़ुशी और नई ज़िन्दगी,

किलकारियाँ शिशु की,

खनकती पायल चूड़ियाँ नई बहु की,

और देखे हैं इसने,

कई दुख भरे पल भी ,

सदगति प्राप्त होते बुज़ुर्ग,

विदाई होती बिटिया भी |

सब कुछ समेटे है ये,

कई सालों से,बनके

एक मज़बूत प्रतिक,

जीवन का,

और उसके पल पल बदलते,

हर रूप का |

चौखट : जीवन : दर्शन