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Love and Relationships

Roses n thorns (my garden)

We all have pricking thorns all over our soft fragrant selves.
Love is about removing those thorns one by one.
Getting hurt and bruised too in the process.
But trying to fill in the soft self with deep love, and care and healing it fully.
It doesn’t happen overnight.
It takes time,

patience and effort.
That’s where people lose the track-
Thinking thorns as the only reality, not the true soft fragrant self.

Even if you pick up those thorns, you will find the rarest essence of the soft self in it and you will take that pain as a reward of building a very strong love in time to come.
Only if you are willing to go that far and deep.
No love is all sweetness n

And softness.
It sharply tears you from within.
And shakes your inner core deeply,
Like a sky- shattering and blinding lightning thunder.
Unless you understand that deep pain,
You wont understand what true love is.

LOVE : FRAGRANCE : THORNS

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अधूरा

अधूरा

किसीको घर ना मिला,

किसीको घरवाले,

कोई माँ की छाया के बिना पका,

तो कोई पिता की डाँट बिना,

कोई बेऔलाद रहा,

कोई औलाद खोता गया,

कहींभाई को बहन की आस रही,

तो कहीँ बहन को भाई की,

कोई प्रेमी ढूँढ़ता रहा,

तो कोई बदलता,

कोई अपने कद को रोया,

तो कोई अपने रंग को,

किसीको बेदाग़ रूप की चाह रही,

तो किसीको दमकते देह की,

कोई शिक्षा से वंचित रहा,

तो कोई कला से,

कोई दो रोटी के लिए तरसा,

तो कोई छप्पन भोग के,

किसीको शौहरत की प्यास रही,

तो किसीको दौलत की,

कोई जिस्मों में उलझा रहा,

तो कोई नशे में,

कोई सावन में भी सूखा रहा,

तो कोई धूप में भी अँधा,

कोई बीते वक़्त को रोता रहा,

तो कोई आने वाले समय को,

कोई ज़माने के लिए जीता गया,

तो कोई दिखावे के लिए,

हर एक इंसान अधूरा रहा,

कुछ हो ना हो,

कोई हो ना हो,

ये अधूरापन यूँही रहा,

इस अधूरेपान को कभी ना भर पाया कोई,

और यूँही ज़िन्दगी बीतती गई हर किसीकी,

अधूरी सी,

अधूरी सी,

अधूरी सी |

#tulipbrook #hindinama #अधूरा #ज़िन्दगी

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नीर

Source- Aakash Veer Singh Photography

इस नीर के रूप निराले हैं,

कभी बन जाता है ये एक बलखाती नदिया,

तो कभी एक शालीन सा तालाब,

कभी बन जाता है ये एक मदमस्त झरना,

तो कभी समुद्र में उठता हुआ कोई सैलाब,

कभी बन जाता है ये ऊष्ण का धुँदला धुआँ,

तो कभी सावन की घनघोर घटा,

कभी गिरता है ये बदली से यूँ,

टप टप इस धरा पर,

तो कभी ठहरता है दमकते मोती सा,

सर्द सुबह में खिले किसी पँखुरी पर,

कभी बन जाता है ये तृष्णा में ओक,

तो कभी गदगद होते हुए ह्रदय का शोक,

झलक जाता है इन नैनों के सिरों से,

इस तरह जैसे हो गुमसुम सी धरा कोई,

जिसका स्रोत और गंतव्य दोनों ही,

एक गहरा उनसुलझा रहस्य हो कोई |

नीर : स्रोत : गंतव्य

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Voice of a dying rose


I’ll keep my beauty alive,
In these dried discolored petals,
And memories of exchange-
Love, death, celebration,
Which became a part of me,
As I adorned those spaces,
In garlands and wreaths,
On walls and vases,
On dinner tables and hair buns,
And places where I got unnoticed,
Yet completed a picture perfect.
As I reminisce those moments,
And accept my fate,
I sing in a melancholic tone,
A farewell song to myself,
Before I crumble and disintegrate,
Into countless tiny particles,
And merge forever,
In this vast existence.

rose: voice: life

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षड रस – रिश्तों के

जैसे भोजन में छः प्रकार के रस होते हैं, जो एक संतुलन देते हैं आहार को, उसी प्रकार रिश्तों में भी रस होते हैं, जो मिल जुलकर एक जीवन में एक संतुलन बनाए रहते हैं |

षड रस

मधुर स्नेह माँ का,
एक सुकून पहुँचाता है,
व्याकुल इस मन को |
अम्ल स्वाभाव पिता का,
तीक्ष्ण सा एहसास पहुँचता है,
सुस्त से इस तन को |
लवण स्वर भ्राता के,
एक उत्साह ले आते हैं,
उबाऊ से इस जीवन में |
कटु उपदेश गुरु के,
स्पष्टता ले आते हैं,
उलझे से इस ह्रदय में |
तिक्त आलोचना गैरों की,
शुद्ध कर देती है,
पाखण्ड की ओर बढ़ते खुद को |
कशाय ज्ञान आत्मन का,
एकाग्र कर देता है,
बिखरे से जीवन को |

जीवन : रस : रिश्ते

दर्शन, inspiration, Mythology, poetry, Souful, Spiritual, Uncategorized

Navratri – नौवी रात – माँ सिद्धिदात्री

आज की काव्यांजलि माँ सिद्धिदात्री को अर्पित |

माँ सिद्धिदात्री

सर्व सिद्धि प्राप्त जिसे, 

सदैव हँसमुख और सौम्य जो, 

श्वेत वस्त्र, कमल पर विराजमान, 

शिव को अर्धनारीश्वर बनाने वाली, 

भक्तों को कार्यरत रहने की, 

अमूल्य सीख सिखाने वाली, 

एकाग्रता और समर्पण से, 

कर्म करने का ज्ञान देने वाली, 

माँ  सिद्धिदात्री को, 

मेरा शत शत नमन |

नवरात्री : सिद्धि : सिद्धिदात्री

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नवरात्री – आँठवी रात – माँ महागौरी

आज की काव्यांजलि माँ महागौरी को अर्पित |

माँ महागौरी


श्वेत वर्ण, 

रमणीय रूप,

शान्त आभा, 

सुगम ऊर्जा से, 

भक्तों को सदा, 

संतोष का बोध कराने वाली, 

शान्ति स्वरूपा वो, 

सदा सबको काल-कर्म के, 

अमोघ शक्ति का, 

अमूल्य ज्ञान देने वाली, 

हलके गुलाबी रंग की तरह,

सदा आनंद पहुँचाने वाली, 

दुर्गाष्ठत्मी की रात्रि को, 

देवी माँ महागौरी को, 

मेरा शत शत नमन |

नवरात्री : शान्ति : महागौरी

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नवरात्री – साँतवी रात – माँ कालरात्रि

माँ कालरात्रि

जब जब बढ़ा असुरों का प्रकोप, 

और देव गण में हाहाकार हुई,

 पहुँचे विनती करने महादेव से, 

अपनी रक्षा की गुहार लगाने, 

तब शिव ने पार्वती को भेजा, 

असुरों का संहार करने, 

रौद्र रूप धारण करके, 

क्रोध में सुलगे नेत्र,

 लहू तृष्णा भरी जिव्हा लिए, 

बेलगाम काली जटाएँ,

 हाथ में खंड, तलवार लिए, 

गहरा श्याम रंग, 

महाकाया अग्नि आभा लिए, 

वद किया उस देवी ने, 

रक्त बीज और शुम्भ निशुम्भ का, 

किया विनाश दानवीय ऊर्जा का, 

जन कल्याण के लिए, 

दी सीख भक्तों को, 

सदैव निर्भीक रहने की,

 कैसी भी चुनौती आए, 

जब दाँव लगी हो गरिमा,

 और सच्चाई पर वार पड़े, 

तब तब उठा लो शस्त्र अस्त्र,

बुराई के संहार के लिए |

ऐसी अभया देवी, 

माँ कालरात्रि को, 

मेरा शत शत नमन |

नवरात्री : निर्भया : कालरात्रि

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नवरात्री – छँटी रात – माँ कात्यायिनी

आज की काव्यांजलि माँ कात्यायिनी को अर्पित |

माँ कात्यायनी

कात्यायन ऋषि के ताप से, 

प्रसन्न होकर जन्मी दुर्गा माँ, 

उनकी कुटीर में, 

निःस्वार्थ भाव वाली, 

रोग, भय, कष्ट नाशिनी, 

महिषासुर मर्दिनी वो, 

जिसे राम कृष्ण ने भी पूजा, 

अमोघ फलदायिनी वो, 

जिसके स्मरण मात्र से भक्तों को, 

जाग्र चक्र सिद्धि प्राप्त हुई, 

कुसुम कुँवारी कन्या भी, 

माँ की सच्ची अर्चना से, 

विवाह पर्यंत सौभाग्यकांक्षिणी बनी, 

ऐसी देवी को मैं अर्पित करुँ,

 पुष्प, हल्दी,शहद की सुनहरी भेंट,

और करूँ नमन सैकड़ो बार, 

सत्यनिशठा से माँ कात्यायनी का |

नवरात्री : निःस्वार्थ :कात्यायिनी