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नवरात्री – पाँचवी रात – माँ स्कंदमाता

आज की काव्यांजलि माँ स्कंदमाता को अर्पित |

माँ स्कंदमाता

जननी कार्तिकेय की, 

लेकर अंचल में अपने, 

उग्र सिँह पर विराजमान, 

चतुर्भुजा वाली देवी, 

अभय मुद्रा धारण करके,

 इस ब्रह्माण्ड की असीमता को दर्शाती,

 अपने भक्तों को सदा, 

निःस्वार्थ कर्म एवं सेवा का भाव सिखाती,

 ऐसी करुणा दायिनी देवी, 

माँ स्कंदमाता को मेरा शत शत नमन |

नवरात्री : निःस्वार्थ : स्कंदमाता

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नवरात्री – चौथी रात – माँ कुष्मांडा

आज की काव्यांजलि माँ कुष्मांडा को अर्पित |

माँ कुष्मांडा

माँ कुष्मांडा 
घनघोर तिमिर सा था ये ब्रह्माण्ड, 

इसमें प्रकाश की प्रचंडता भर दी,

केवल अपनी मनमोहक मुस्कान से,

उस सिंह वाहिनी अष्टभुजा धारी देवी ने, 

सदा जो भक्तों की रक्षा करती, 

शस्त्र अस्त्र से,

और उन्हें वरदान देती, 

अष्टसिद्धि नौनिधि के ज्ञान का,

 जो सबको दृष्टि की स्पष्टता प्रदान करती,

जीवन में उत्तेजना के दुष्परिणाम को समझने की, 

और भक्तों के भीतर के क्रोध का नाश करने की |

ऐसी शान्तिप्रिया,  

माँ कुष्मांडा को मेरे शत शत नमन |

नवरात्री : शान्ति : कुष्मांडा

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नवरात्री – तीसरी रात – माँ चंद्रघंटा

आज की काव्यांजलि माँ चंद्रघंटा

को अर्पित |

माँ चंद्रघंटा

शिव की प्रिय अर्धांगिनी, 

समर्पण का अनूठा रूप, 

मस्तक पर घंटे समान अर्धचंद्र लिए, 

दस हाथों वाली, 

त्रिशूल, गदा, तीर जैसे शास्त्र अस्त्र लिए,

 अभय एवं वरद मुद्रा धारी, 

सिंह वाहिनी वो देवी,

 सदैव भक्तों की रक्षा करती,

 उनपर अपना आशीष बिछाये |

ऐसी माँ चंद्रघंटा को,

 मेरा शत शत नमन |

नवरात्री : चंद्रघंटा : समर्पण

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नवरात्री -दूसरी रात – माँ ब्रह्मचारिणी

आज की काव्यांजलि माँ ब्रह्मचारिणी को अर्पित |

माँ ब्रह्मचारिणी

धैर्य की ऐसी मिसाल, 

जो प्रेम का अभिप्राय बदल दे, 

हज़ारों सालों के जटिल तप से, 

योगी शिव को भी आकर्षित कर ले,

 महलों की राजकुमारी जब,

 सब कुछ त्याग कर, 

एक ही जाप करने लगे, 

हर विपदा में अडिग खड़ी, 

अपने स्वामी शिव सा जीवन व्यतीत करे, 

तो क्यूँ ना महादेव भी, 

ऐसी भक्ति को वरदान प्रदान करे, 

ब्रह्मचारिणी उस धैर्य की देवी को, 

अर्धांगिनी बनाकर अपनी,  

प्रेम के सत्य तप का सम्मान करे |

कमंडल और जाप माला लिए, 

श्वेत कमल धारण किए,

 नारंगी अग्नि का तेज लिए, 

खुद इस प्रेम ताप से निखरकर, 

शिव को भी अपने ऊष्ण से, 

प्रज्वलित जो कर दे, 

ऐसी माँ ब्रह्मचारिणी को, 

मेरा शत शत नमन |

नवरात्री : ब्रह्मचारिणी : धैर्य

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नवरात्री – पहली रात – माँ शैलपुत्री

माँ के नौ रूपों में आज माँ शैलपुत्री को अर्पित ये काव्यांजलि |

माँ शैलपुत्री

श्वेत रंग की पवित्रता लिए,

 पर्वतों की ढृंढता लिए, 

काया में सौम्यता लिए,

 आभा में भव्यता लिए, 

शीर्ष शोभित अर्द्ध चन्द्र से, 

हस्त में विराजित त्रिशूल और पंकज,

नंदी की सवारी करती, 

माँ पार्वती का प्रतिरूप, 

महादेव की सुन्दर अर्धांगिनी,

 माँ शैलपुत्री को मेरा शत शत नमन |

ॐ या देवी सर्वभूतेषु करुणरूपेण संस्थिता |

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ||

का जाप किए, 

श्वेत सुगन्धित पुष्प अर्पित करुँ चरणों में तेरे, 

कपूर लौंग की ज्योत जलाकर, 

भोग लगाऊँ क्षीर मिश्री का,

संकल्प लूँ आज मैं,

सदा स्थिर और ढृंढ़ रहने का,

हर स्तिथि में,

हर अवस्था में |

नवरात्री : देवी : शैलपुत्री

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नसीब

आदाब, हम ज़िन्दगी का कितना वक़्त यूँही ज़ाया कर देते हैँ,. फ़िक्र और अफ़सोस में |अच्छा बुरा जो भी हुआ, उसे अपनाकर आके बढ़ने के बजाए, यूँही नसीब को दोषी करार कर देते हैं | जिन्मेदारी लेने के बजाए किस्मत को ही ज़िम्मेदार ठहरना वाजिब समझने लगते है | एक छोटी सी नज़्म इसी ख्याल पर |

नसीब : उम्मीद : विश्वास

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Cosmic Delight

The cosmos always amazes us, be it the moon, the sun, a star, a constellation or the milky way. Everything looks mesmerizing and a splendid phenomenon. Let’s celebrate the beauty of this cosmos, through a series of poems under the title, “Cosmic Delight”.

A star-lit night

When I look at the stars,

I adore the balmy twinkling, 

Of these cosmic beauties.

That create beautiful patterns, 

On the canvas of this Prussian sky. 

And make the onlooker realize,

 It’s the flagrant desire. 

That gives a resplendence, 

That reaches the fathomless terrains,

 And brightens up the darkest facades.

Leaving a soothing hope, 

That inner light is magic, 

With a message-” Let it shine uninhibited, 

And spread its glow, 

To the seekers of truth, 

Who traverse the murky paths,

 And the treacherous routes, 

To reach the final destination, 

Of the light of pure veracity. “

STARS: NIGHT: TWINKLE

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Seven Social Sins- First Sin- Wealth Without Work

Morality and ethics keep us sane and stable. But the nature of human intellect is such that it acts negatively, more than in the positive. The outcome, a grave sin. Seven Social Sins exist, which are the consequence of vices like greed, lust, and vain. These sins attack the thread of ethics and break it often. A contemplative poem on the first such sin- Wealth Without Work.

SINS

The Lines

The rich trampling the masses.

The rich try to flash and flaunt,
With the sole intent to harrow and haunt,
The masses and have nots, to keep cursing their fate,
When a minuscule gathers plenty, at an unprecedented rate.
The majority consistently toil and fail,
While the privileged sit idle and sail,
Through the currents of life’s streams,
Washing away mercilessly people’s most cherished dreams.
Where the haves claim their voice as music and harmony,
And demean the have nots as creating an untuned cacophony.
There lies a dark truth untold,
In that glittering tooth of gold,
There lies a sin concealed,
In that diamond-studded shield,
There lies a voice of manipulation,
In that philanthropic exaggeration,
Where,
Servitude to the rich, of the masses,
Is forced gratitude on those classes,
Claiming the superiority of responsibility,
In being the self-proclaimed harbinger of protecting false vulnerability.
A structure formed-
Where,
The dusty undertones of vain and greed,
Is covered with coats of glossy shades,
Showing genuine concern for others’ need,
With hollow selfless serenades,
And the murky foundation of wilful indolence,
Which can not bear the load of perseverance and patience,
Develop fault lines and crevices,
From which oozes out the inner vices,
Which are filled with the sticky gel of unscrupulous actions,
In the name of hyped market jargons and complicated business speculations,
And covering the chipped walls with rational stance and lies,
Severing all connections with natural ties,
Garnering the vice of greed on this shaky structure,
On the pretext of providing a livelihood that is bound to rupture,
With the burden of accelerating rents and taxes,
And the crunching income and incentive relaxes.
A time comes when the cracks become too large,
To fix it with a recklessness, a hasty barge,
And the fallen structure is again rebuilt,
By the have nots digging the land and filling the silt,
Toiling again in sheer servitude,
To fill the chests of the greedy attitude,
Over brimming again with flashiness and flaunt,
To relive the story of harrow and haunt,
A pricking gift for the masses,
From the privileged classes.

SIN: WEALTH: VICE