inspiration, poetry, Soulful

जीवंत

इस अंतारंग के संताप को,इस कदर घोला तुमने,अपने महासागर रुपी प्रेम में,जैसे घुलती हो ये जमी उंगलियाँ,इन ऊन के धागों से बुने दस्तानों में,जो सौम्य सा सौहार्द देते हैं,दिसंबर की ठिठुरती ठंड में |और यूँ बेपरवाह सी जीती हूँ मैं अब,ना सूरज के उगने की चिंता होती है,ना ही कलियों के खिलने की चाह |
अब तो आभास होता है,एक क्रान्ति सा परिवर्तन का,इस अंतर्मन में,जिसे सदियों से जकड़ रखा था,कई दानावों ने,जो कुचलते रहे सोच को,छीनते रहे शान्ति,औरमेरे काल्पनिक उल्लास को भी |आज,आखिरकर,मैं उन्मुक्त हूँ,निरंकुश और श्वसन,हाँ!आख़िरकार,मैं सही मायने में जीवंत हूँ |

दर्शन, philosophy, poetry

सड़क

रोज़ गुज़रते हैं यहाँ से,

भोर के ख़ुशनुमा ख़्वाब कई ,

दोपहर की उजली उजली सी ये उमंग,

साँझ की अचल निराशा,

और रजनी का गहरा चिंतन भी |

हर उम्र यहाँ ठहरती है,

अपने अपने हिसाब से,

फलों की फेरी लगाता वो नौजवान,

करता उम्मीद दो रोटी की,

सुबह की बस का इंतज़ार करता,

वो छोटा सा बच्चा,

मिलने को उत्सुक अपने दोस्तों से,

साइकिल पर कॉलेज जाते,

दोस्त यार कई,

बेफ़िक्र दुनिया की परेशानियों से,

स्कूटर पर दफ़्तर जाते वो अंकल,

देने एक सुरक्षित जीवन,

अपने परिवार को,

यूँही पैदल चलती वो गृहणी,

हाथ में सब्ज़ी का थैला लिए,

गृहस्ती की ज़िम्मेदारी निभाती हुई,

लाठी संग हौले हौले चलती,

दादा नाना की ये टोली,

करने सैर और बात चीत |

कोई यहाँ उम्मीद छोड़ जाता है,

कोई थकान और शिकन,

कोई यहाँ आने वाले वक़्त की ख्वाहिशें,

कोई बीते हुए पलों की रंजिशे |

कभी यहाँ जश्न होता है,

कभी शोक और मौन भी,

कभी यहाँ काफिले निकलते हैं,

कभी सुनसान आहटें भी,

कभी यहाँ खिलती हैं मुस्कान,

कभी झड़ती मुरझाए साँसें भी,

सब कुछ यहीं होता है,

हर रोज़, हर पल,

यूँही ये सड़क बन जाती है,

एक अहम् हिस्सा,

सबके जीवन का |

दर्शन, philosophy

आग

एक धुआँ आतिश का,
एक सलील का,
एक सौहर्द देता,
एक ज़ख्म,
एक प्रेमाग्नि जैसा,
एक क्रोध की ज्वाला,
दोनों ही इस हृदय की उत्पत्ति हैं |

दर्शन, philosophy

दर्शन

अज्ञानता भावहीन है,
ज्ञात होना भावपूर्ण,
प्रथम हैं इस श्रेणी में,
भाव शंका के, भय के,
एवं आश्चर्य के |
बढ़ती तृष्णा भी है,
और असमंजस भी |
अगर असमंजस विजयी हुई,
तो भय प्रबल होता जाएगा,
अगर तृष्णा विजयी हो जाए,
तो फिर ये भाव परिवर्तित होते हैं,
स्पष्टता में, निर्भीकता में,
और धीरे धीरे व्यक्ति,
संभाव की स्तिथि तक पहुँच जाता है,
ये सफ़र ज्ञात से बोध का है |

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वक़्त

वक़्त,
एक कलम की तरह,
ज़िन्दगी की तख़्ता-ए-स्याही पर,
लिखता है हिब-ए-मरासिम के फ़साने,
लेकिन,
कुछ आसान सा नहीं नज़र आता,
इस कलम का इज़हार-ए-इश्क़,
और ये जज़्बातों की लकीरें,
कुछ सिमटी सी नज़र आती हैं,
क्योंकि रुख बदल देती उनका,
ये नबीना असूलों की हवा,
और तब्दील कर देती हैं,
हयात इस पाक इश्क़ की,
बस,
यूँही देखते देखते,
कुछ अधूरे टूटे लफ़्ज़ बाकी रह जाते हैं,
और ओंझल हो जाती है वो हसीन दास्ताँ |
लेकिन झिलमिल आँखों की बूँदों से,
बयाँ कर ही जाती हैं,
वो दर्द-ए-दिल की कसक को भी,
जिसे तख़्ता-ए-स्याही पे कभी ना लिख पाए |

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स्वीकृति

तालिका की सतह पर,ये हल्की गहरी रेखाएँ,कोई लम्बी, कोई छोटी,कोई पतली,कोई मोटी,कहीँ कटी,कहीँ रुकी,कहीँ बँधी,कहीँ खुली,कहीँ उठी,कहीँ झुकी,कहीँ दौड़ती,कहीँ लहराती,कहीँ मिलती,कहीँ जुदा होती,कहीँ चिन्ह हैँ,कहीँ दाग़ हैँ,कुछ मिटा सा है,कुछ छुपा सा है,कुछ बदलता है,कुछ स्थायी है,ना जाने क्या राज़ है इनमें,ना जाने क्या खुलासे हैँ,ना जाने क्या बातें हैँ,ना जाने क्या किस्से हैँ |जो भी है,वो यहीं है,इन्हीं रेखाओं में,भूत,वर्तमान, और भविश्य भी,काल,और पल भी,सम्पूर्ण,और अधूरा भी |ये स्वीकृति है,इस भाग्य की,कर्म की,और कारण की,प्रत्यक्ष के प्रमाण है,तर्क के विज्ञान है,विश्वास की,शंका की,उम्मीद की,हताशा की,वेदना की,संवेदना की,लाभ की,हानि की,स्मृति की,कल्पना की,इस जीवन के-क्षणभंगूर रूप की,स्वीकृति है |

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ग़म

यूँ तो ज़िन्दगी में,

हर जज़्बात मौजूद है,

मगर ग़म की बात करें तो,

कोई रहकर देता है,

कोई जाकर,

कोई कहकर दे जाता है,

कोई चुप रहकर,

कोई यकीन के नक़ाब में,

कोई फ़रेब के खुलासे में,

कोई झूठ के लिबास में,

कोई सच के एहसास में,

कोई करीबी होकर,

कोई दूरी बनाकर,

कोई प्यार करके,

कोई वार करके,

कोई अपना बनके,

कोई अनजाना बनके,

कोई क्षण भर ही,

कोई ताउम्र तक,

ये ग़म दे जाता है |

वो ग़म फिर,

कभी बहता है,

इन अश्कों से,

किसी सैलाब की तरह,

कभी भड़कता है,

इन नैनों में,

किसी लावा की तरह,

कभी गरजता है,

इन लबों से,

किसी तूफ़ानी बादल की तरह,

कभी ठहरता है,

इस ललाट पर,

किसी गहरी निशा की तरह,

कभी चुभता है,

इस देह में,

किसी रेगिस्तानी शूल की तरह,

कभी नज़र आता है,

एक प्रचण्ड अस्तित्व सा,

कभी ओझल हो जाता है,

किसी साये की तरह |

ग़म : ज़िन्दगी : जज़्बात

दर्शन, philosophy, Spiritual

नमी

सतह सुर्ख है,तृष्णा गहरी है,प्रेम का असीम समंदर है अन्दर,फिर भी ना जाने कैसी अजब कमी सी है |उठता है तूफ़ान इस कदर,हर पल फूटना चाहता हो जैसे,मगर ये अश्क़ बहते भी नहीं,दो बूँद नैनों में झलकती भी नहीं,जबकि श्वासों से लेकर देह तक इतनी नमी सी है |क्यूँ फैला है अनन्त तक,ये खालीपन ?ना अँधेरा है ना ही रोशनी,ना नज़र आता ऊपर ये आसमान,और ना ही महसूस होती नीचे कोई ज़मीन सी है |कुछ रुका भी नहीं,कुछ बहा भी नहीं,कुछ दिखा भी नहीं,कुछ छुपा भी नहीं,कोई आरज़ू भी नहीं,कोई शिकायत भी नहीं,ना ही बेबसी है,ना ही बेचैनी है,ना जाने कैसी रहस्यमयी एहसास है ये,कभी ना तृप्त होने वाली वीमोही प्यास है ये |

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स्तब्ध

image source : internet

स्तब्ध

शान्त है श्वास,
धड़कन स्थिर है,
ये निर्जीव स्तिथि नहीं,
स्तब्ध अस्तित्व है |
प्रेम के सौहर्द ताप की,
ये अग्नि अवग्य होकर,
जब कोप की ज्वाला बनी,
तब नष्ट हुआ,
ह्रदय का भार,
समय और भावनाओं से बना,
जो कभी सुकून था,
वो आज बोझ है,
जो पहले स्वतंत्र था,
आज जकड़ा हुआ है |
और फिर चूर चूर हुआ सब,
कतरा कतरा इस कदर बिखरा,
सिसकियों और अश्कों के,
तूफ़ान और समंदर की तरह |
शान्त हुई ज्वाला अब,
बहता गया अतीत यूँ,
और हर बूँद चुभती हुई,
किसी शूल की तरह,
छोड़कर गहरे घाव,
और यूँ रह गई फिर –
शान्त ये श्वास,
धड़कन ये स्थिर,
ये निर्जीव स्तिथि नहीं,
स्तब्ध अस्तित्व है |

जीवन : जज़्बात : स्तब्ध

दर्शन, inspiration, philosophy

क्या?

क्या पँखुड़ी फूल से जुदा है?क्या कली को अपना कल पता है?क्या बहार पतझड़ से डरती है?क्या बंजर ज़मीन फूटने से कतरती है?क्या नदी ठहरना चाहती है?क्या सागर बहना को तरसता है?क्या आकाश सूर्य से रंग चुराता है?क्या सूर्य बादलों पे प्यार जताता है?क्या चाँद रोज़ बेनक़ाब होना चाहता है?क्या सूरज कुछ दिन विश्राम करना चाहता है?क्या हवा अपनी गति की मोहताज होती है?क्या बारिश की बूँदों में भी प्यास होती है?क्या रात को दिन से ईर्ष्या होती है?क्या शाम को अपने अस्तित्व की चिंता होती है?क्या फूलों को अपनी महक पे अभिमान होता है?क्या पर्वत को अपनी विशालता पे गर्व होता है?क्या सूखे फूलों को फिर से खिलने की इच्छा होता है?क्या टूटी लहरें फिर से उभरना चाहती हैं?क्या सुलगता लावा भी ठंडकता चाहता है?क्या बर्फ़ की चादर भी गर्माहट चाहती है?क्या कोयला हर बार हीरा बन पाता है?क्या टूटा कॉंच फिर से जुड़ पाता है?क्या दर्द को दवा की ज़रूरत होती है?क्या दुआ हर बार पुरी होती है?क्या ये उदासी इतनी ज़रूरी होती है?क्या ये ख़ुशी एक मजबूरी होती है?क्या ये अश्क़ कमज़ोरी होते हैं?क्या ये प्रेम यूँही सदैव रहता है?क्या एक दूजे से मिलना तय होता है?क्या ये रिश्ते अकेलेपन से कीमती हैं ?क्या ये अपने गैरों से क़रीब होते हैं?क्या पहचान अनजान होना चाहती है?क्या अनजान हमेशा के लिए जुड़ना चाहते हैं?क्या खोना जीवन का दस्तूर होता है?क्या पाना हमेशा स्वार्थ होता है?क्या है और क्या नहीं?क्यूँ है और क्यूँ नहीं?कब है और कब नहीं?इसका तो पता नहीं,मगर,ये सवाल यूँही उठते रहेंगे,कुछ का जवाब मिल जाएगा,कुछ यूँही रहस्य बनके रहेंगे |

क्या : रहस्य : सवाल