दर्शन, philosophy, poetry

अवशेष

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अवशेष

एक अस्तित्व था,
जिसका
आकार भी,
रूप भी,
छवि भी,
औचित्य भी,
जो
काल बध्य होकर,
पूर्ण था,
मगर
क्षण क्षण घटता गया,
उसका आकार,
उसका रूप भी,
उसकी छवि,
उसका औचित्य भी,
और आज जो प्रत्यक्ष है,
वो सिर्फ़ अवशेष हैं,
अधूरी कहानी से,
किसीके इतिहास के,
जो सिर्फ़ तर्क वितर्क,
और अनुमान के दायरे में,
सीमित रहकर,
एक शोध का विषय बन जाएँगे,
मगर
क्या कभी भी,
इस अवशेष का,
सत्य हम जान पाएँगे?

दर्शन, inspiration, philosophy, Soulful

उम्र

Credits : Aakash Veer Singh Photography

नश्वर होना यही है,

माप लेते हो अस्तित्व को,

उस प्रणाली के दायरे में,

जो इन्सानों द्वारा बनाई हुई,

इन्सानों के लिए |

जैसे हम मनाते हैं,

जन्मदिन और सालगिराह,

और पकते हैं ये रिश्ते,

उम्र और वक़्त गिनकर,

वैसे ही बढ़ती है ये ज़िन्दगी,

दो संख्याओं के बीच,

और तय करती है ये सफ़र,

जो बदलता है पल पल,

एक संख्या से,

दूसरी संख्या तक |

उम्र : संख्या : जीवन

poetry, Soulful

प्रेम

जाओ पूछो उस पूनम के चाँद से,

कि कितनी तड़प थी,

 इस चाँदनी रात में,

तुझसे मिलने की |कतरा कतरा रोशनी भी,

चुभन मीठी सी देती है,

तेरा स्पर्श मेरे होठों पर,

और इस कोमल काया के,

 हर एक अंग पर, गहरी छाप छोड़ जाता है,

तूने इसे छुआ जो है,

प्रेम से |


वो निशा भी साक्षी है,

उन अर्द्ध गहरी स्वाशों की,

और नैनों की खोयी निद्रा की,

जो इंतज़ार में रहते हैं, 

तुझे छूने के लिए,

और समाना चाहते हैं खुदमें,

इस समय को यहीं रोक कर |

बस दो लफ्ज़ कहकर,

हम खामोश हो जाएँ,

महसूस करने के लिए,

 उन लफ़्ज़ों की ऊर्जा को,

और ध्वनि की ये आवृत्ति,

यूँही गूँजती रहे,

तुम्हारे और मेरे,

 रोम रोम में,

अनंत तक |


ये शीतल झील,

भी बयान कर रही है,

कि मिलन की आस में,

जब छुआ मैंने,

अपने उग्र तन से,

किस कदर ऊष्ण हुई,

नीर की एक एक बूँद,

और यूँही धुआ धुआ,

हुआ ये नीला गगन,

संध्या की बेला में,

लालिमा लिए,

सूर्य की नहीं,

 मेरे तेजस्वी प्रेम की,

जिसकी अग्नि जगमगा सकती है,

ब्रह्माण्ड के सैकड़ो आकाशों को,

इस काल चक्र के दायरे से परे |


क़ायनात का ज़र्रा जर्रा भी,

समाए हुए है,

इस प्रेम का अस्तित्व,

इस मिलन की लालसा,

इस इंतजार की पीड़ा,

और मेरे हर जज़्बात की छवि,

कि जब भी तू देखे,

चाहे इस असीम नभ को,

 या इस प्रगाढ़ अवनि को,

चाहे वर्षा ऋतु के वृक्षों को,

 या पतझड़ में बिखरे पत्तों को,

चाहे गहरे समुन्दर को,

या ऊँचे पर्वतों को,

चाहे बहती नदियों को,

या बरसती बौछारों को,

चाहे कच्चे रास्तों को,

या पक्की इमारतों को,

सब में पाए ,

 बस येही,

मेरे प्रेम को |

प्रेम : तुम : मैं

दर्शन, poetry

पुष्प

© tulip_brook

नन्हे से इन पुष्पों को,

एक पत्र का अंचल मिला,

मिश्री सी लोरी बनी ये हवा,

मखमली सौहार्द मिला सूर्य से,

गुदगुदी शय्या बनी ये धरा,

और ये गहरे नीले पुष्प,

एक लम्बी निद्रा यात्रा के लिए अग्रसर हुए,

चिदाकाश का आभास करने,

भूमि का जीवन त्याग कर,

एक नया अस्तित्व बनाने |

पुष्प : जीवन : निद्रा

philosophy, Soulful

प्रेम

ये आकाश आधार है इस प्रदीप्त की चमक का,

और

ये प्रदीप्त, दुनिया के सामने अस्तित्व है इस आकाश का,

पूरक हैं एक दूजे के ये,

ये ही सत्य है,

ये ही तथ्य है,

ये ही प्रेम है |

प्रेम : आकाश : प्रदीप्ति

दर्शन, inspiration, philosophy

कारीगर

सार्थक है हर जीवन, सार्थक है हर रूप |

पत्थर की चट्टाने खड़ी थी,

सदियों से अडिग और स्थिर,

वहाँ पहुँचा एक कारीगर,

लेके अपने पैने नोकीले औज़ार,

और

आया उसे एक विचार,

कि मैं तराशु इन पत्थरों को,

तोड़कर इस चट्टान का आकार |

फिर टुकड़े टुकड़े हुए कई,

लगा जैसे तबाही मची हो कोई,

मगर हर टुकड़ा नायाब था,

बनने को तैयार एक रूप,

कोई बना हँस तो कोई सिँह,

कोई बना कछुआ तो कोई सर्प,

कुछ लम्बे टुकड़े ने स्तम्भ का रूप लिया,

जो जुड़कर बने एक धरोहर,

एक अनूठे इतिहास की,

जो लिखा गया पत्थरों में,

और जिया अरसों तक,

कुछ टुकड़े अनोखे थे,

उन्होंने लिया दिव्य स्वरुप,

और बन गए मूरत भगवान की,

कुछ टुकड़ों ने खुद को टूटा पाया,

व्यर्थ लगने लगा उनको उनका अस्तित्व,

उनका बना ना कोई भी आकार,

वो तब्दील किए गए कणों में,

और उन बने हुए रूपों की दरारों के मरहम बनें,

ऐसे साकार हुआ उनका जीवन,

हर कण का,

हर टुकड़े का,

हर चट्टान का,

और

हर कारीगर का भी |

पत्थर : कारीगर : दर्शन

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अपनी ज़मीन से जुड़ना

जब पहुँची अपने गाँव, तब जाना अपने अस्तित्व को, बड़े ही क़रीब से | और बैठी हुई मैं, घर के इस आँगन में, सोचती रही कुछ यूँ |

आँगन

ये आँगन टूटा फूटा सा,
और ये धरातल की दरारें, बयाँ करती हैँ दास्तान,
कुछ पुरानी यादों की, ग्लानि और अभाव से पूर्ण,
ये दीवारों के उतरता रंग,
एक व्याख्या प्रकट करते हैँ,
अधूरी ख्वाहिशें के, बिखरने की,
उलझे रिश्तों के, जकड़ने की,
कुछ खामोशियों की, कुछ सिसकियों की,
जो आज भी सुनाई देती हैँ,
ये ही आभा है, अतीत की, जो प्रत्यक्ष है, मगर समीप नहीं|
है नेत्र की सीमा से परे, मगर जाती हैँ, अंतर्मन के दायरे की ओर,
और छू जाती हैँ, उस सूक्ष्म कण को,
जो ओझल सा था, मगर असीम सा, अस्तित्व लिए हुए,
अतीत का, वर्तमान में, भविष्य तक |

ज़मीन : आँगन : अस्तित्व