दर्शन, philosophy, Spiritual

नमी

सतह सुर्ख है,तृष्णा गहरी है,प्रेम का असीम समंदर है अन्दर,फिर भी ना जाने कैसी अजब कमी सी है |उठता है तूफ़ान इस कदर,हर पल फूटना चाहता हो जैसे,मगर ये अश्क़ बहते भी नहीं,दो बूँद नैनों में झलकती भी नहीं,जबकि श्वासों से लेकर देह तक इतनी नमी सी है |क्यूँ फैला है अनन्त तक,ये खालीपन ?ना अँधेरा है ना ही रोशनी,ना नज़र आता ऊपर ये आसमान,और ना ही महसूस होती नीचे कोई ज़मीन सी है |कुछ रुका भी नहीं,कुछ बहा भी नहीं,कुछ दिखा भी नहीं,कुछ छुपा भी नहीं,कोई आरज़ू भी नहीं,कोई शिकायत भी नहीं,ना ही बेबसी है,ना ही बेचैनी है,ना जाने कैसी रहस्यमयी एहसास है ये,कभी ना तृप्त होने वाली वीमोही प्यास है ये |

दर्शन, inspiration, philosophy, Soulful

ठहराव

Source : Aakash Veer Singh Photography

जीवन ये गतिशील सा,

क्षण क्षण एक बदलाव है,

रफ़्तार की इस होड़ में,

कहीँ खो गया ठहराव है |

हड़बड़ी हर चीज़ की,

बेचैनी हर बात में |

ना निकल जाए ये वक़्त हाथ से,

इसलिए पल पल खोते चले जाते हैं |

ना कोई सुकून है,

ना कोई संतोष है,

बस एक दूसरे से प्रतिस्पर्धा,

सबसे आगे निकलने की होड़ है |

क्या पाने निकले थे,

क्या खोते जा रहे हो,

रफ़्तार की लालसा में,

ठहराव से वंचित होते जा रहे हो |

ज़रा देखो इस नज़ारे को,

सब कुछ ठहरा हुआ,

ये जल,

ये आकाश,

और ये धरा भी |

रुक जाओ कुछ देर यहीं,

प्रतिस्पर्धा और रफ़्तार को भूलकर,

इस लालसा को त्यागर,

महसूस करते जाओ बस,

इस नज़ारे के कण कण को |

मिलते सिरे गगन, नीर, भूमि के,

जहाँ एक रंग दूसरे में विलीन होकर भी,

अपना अस्तित्व नहीं खोता,

आसमान का नीलपन,

इस पर्वत पर चढ़ता है,

पर्वत का प्रतिबिम्ब,

इस जल में झलकता है,

जल का दर्शन,

ये बादल करता है,

ज़मीन का गेरुआ रंग,

इस जल में घुलता है,

जल का कतरा कतरा,

गेरू रंग लेकर भी,

निर्मल लगता है |

ये सब जुड़े हैं,

फिर भी भिन्न हैं,

एक दूजे में मिले हैं,

फिर भी इनकी,

पृथकत्वता बरकरार है |

ज़रा रुको दो पल यहीं,

महसूस करो कुछ देर ही सही,

और देखो इन आसमान, पहाड़,

ताल, और इस ज़मीन को,

एकाग्र मन से,

तो महसूस करोगे,

एक ही भाव,

ठहराव,

ठहराव,

ठहराव |

गति : जीवन : ठहराव

दर्शन, inspiration, philosophy

प्रतिबिम्ब

© Aakash Veer Singh Photography

जब बना ये जलाशय एक दर्पण,

इस अनछुए आसमान का,

तब खुले अनकहे राज़ कई,

और इन बादलों ने बयाँ किए,

अनसुने उनसुलझे रहस्य कई,

जैसे सम्मुख आ गया हो अतीत,

वर्तमान का नीला दामन ओढ़े,

और बैठा हो तैयार इस इंतज़ार में,

कि कोई तो उजागर करे,

इस प्रच्छन्न जज़्बात को,

गहरे काले अंधकार जैसा,

जिसे समझने का हौसला,

सिर्फ़ प्रेम में होता है,

जैसा हुआ है,

इस जलाशय को,

उस आकाश से |

प्रतिबिम्ब : जलशय : आसमान

दर्शन, inspiration, philosophy

प्रेम प्रसंग

photo credits – Aakash Veer Singh (Bilaspur, Chattisgarh)

आसमान की विशाल तश्तरी में,

भानु की रमणीय आभा सजी है,

पर्णों का हरा जालीदार रूप ही, इस वन की शालीन छवि है,

जब बिखरती है ये आभा,

आसमान से उभरती हुई,

और पहुँचती है इस ज़मीन पर,

छनकर पर्णों के जाल से,

ओजस्वी किरणों के रूप में,

तब प्रज्वलित हो उठता है कण कण,

पावन कनक के समान |

ये धूप छाँव का अनूठा मेल ही,

जोड़ता है उस आसमान को इस ज़मीन से,

और ये वन साक्षी बनता है,

इस प्रेम प्रसंग का |

धूप : छाँव : प्रकृति

philosophy, poetry, Soulful

रंग

आज जामुनी गुलाबी सा है ये आसमान,

जैसे हैं मेरे दिल के ये गहरे सुहाने अरमान,

जो नज़र आते हैं नज़रों की इन लहरों में,

जो साहिल की तलाश में उभरती तो हैं,

मगर उस तक पहुँचने से पहले ही,

हर बार टूट कर बिखर जाती हैं |

आसमान : रंग : जज़्बात

inspiration, poetry

चिड़िया

एक नन्ही सी चिड़िया की सुबह |

भोर की ये बेला बड़ी सुहानी,

भीनी भीनी सी बयार की ये रवानी,

बरामदे में शुरू होती किरणों की नादानी,

अंगड़ाई लेती हुई उठती एक नन्ही सी चिड़िया दीवानी,

लेहलहाती अपने उलझे उलझे पँखों को ,

और स्वाश भारती उड़ान से पहले,

झूमती इस कदर डाल डाल पर,

पुकारते हुए एक ही स्वर में,

ना जाने कौनसी बोली में,

ज़मीन पे उतरकर  ढूँढती खाना,

पैनी सी चोंच से चुगती दाना दाना,

फिर उड़ती जल की खोज में,

किसी टूटे मटके या बहते नल के पास,

रुक जाती कुछ देर वहीं,

और भुजाती अपनी प्यास,

फैलाती उन पँखों को फिर से,

इस बार एक ऊँची उड़ान के लिए,

नीले सुनहरे आसमान की ओर,

धीरे धीरे ओझल हो जाती,

नज़रों के दायरे से पारे,दूर गगन में कहीँ |

चिड़िया : जीवन : सुबह