philosophy, poetry, Soulful, Spiritual

वेदना

वेदना की आवृत्ति जब जब उजागर होती गई,

तब तब एक गूढ़ शक्ति उसे तिरोहित करती गई,

मानो जैसे इस अपरिमय अनन्त के,

अस्तित्वहीन सिरों से मुद्रित होती गई,

निदोल सा ये जीवन होता गया,

ह्रदय जितना इसका अवशोषण करता गया,

अभिव्यक्ति उतनी ही तीव्र होती गई,

दोनों में द्वन्द्व बढ़ता ही गया,

और यूँही वेदना की आवृत्ति,

अनुनादि स्तर पर पहुँचती गई,

एक देहरी जहाँ पर आकर,

चयन करना अनिवार्य होता गया,

यहाँ –

आवेग के क्षण क्षीण होते गए,

रिक्त अवस्था सा वक़्त कोंपल होता गया,

तिमिर और दीप्त संयुक्त होते गए,

स्त्रोत और गंतव्य विलीन होते गए |

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आभास

ये अश्रुधारा कोई आगंतुक नहीं,
निवासी है इस ह्रदय द्वीप की,
इसका आगमन नहीं हुआ कभी,
ये आरम्भ से है विभव लिए,
एक सैलाब के अस्तित्व का,
मगर स्थिर रहती है फिर भी,
प्राण वेग को  उत्प्लाव देती हुई,
ठहराव की सुगम प्रबल स्तिथि से,
रिसाव की विश्रृंखल दुर्बल अवस्था में,
तब ही आती है ये,
जब होता है एक निर्दयी आघात,
इसके धैर्य पर,
इसकी स्तिरथा पर,
इसकी निशब्द आभा पर,
इसकी रहस्यमयी छवि पर,
इसके सम्पूर्ण अस्तित्व पर |
और फिर होता है ऐसा आडम्बर,
एक आवेग पूर्ण दृश्य का मंज़र,
जो पहले सब धुंधला कर जाता है,
और फिर
क्षणिक अनुभूति सा,
ओझल हो जाता है,
किसी गहरे तल पर,
जो अंतर्मन की दृष्टि के,
एक सूक्ष्म स्मृति सा,
उसके ही अंक में,
यूँ समा जाता है,
अस्मिता का अभिन्न अंशलेख बनकर |
कर्म और काल के दायरे में,
इस कदर बद्ध होकर,
भौतिक तृष्णानाओं के व्यूह में,
फिर एक दास्तान बनाने,
फिर आघात से विक्षुब्ध होकर,
फिर रिसाव की प्रक्रिया को,
उन्ही चरणों से ले जाकर,
अवगत कराना उसका स्थान,
अस्मिता में |

प्रदीप्ति

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मुखौटे

ना जाने कितने ही चेहरे,
ना जाने कितनी ही पहचान हैं,
इस दुनिया के रंगमंच पर,
ना जाने हर किरदार,
पहनता है कितने ही मुखौटे |
कभी मुखौटा लहराती ख़ुशी का,
भीतर अपने ग़म का सागर लिए,
कभी मुखौटा ग़म के बादल का,
बिन अश्कों की बारिश लिए,
उसी मुखौटे से –
किसीके सामने हँसता है,
किसीके सामने रोता है,
किसीसे मुँह फेरता है,
किसीकी ओर ताँकता है,
कभी आक्रोश में भी ख़ामोशी लिए,
कभी प्रेम में अविरल बोलता हुआ,
कभी निराशा में कोरे लब लिए,
कभी उम्मीद में जगमगाती मुस्कान लिए |
हर इंसान पहनता मुखौटे हज़ार,
कुछ बदलते हैं पल पल,
तो कुछ उम्र भर भी नहीं,
कुछ अपनों के लिए,
तो कुछ होते गैरों के लिए,
कुछ सिर्फ़ एक सच के लिए,
तो कुछ हर तरह के झूठ के लिए |

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स्पर्श

उठा लेती हूँ उन्हें भी,
बड़े ही स्नेह से,
जिन्हें खुदके प्रियवर ने त्याग दिया,
मालूम है मुझे ये सच्चाई,
इस स्नेह से ये फिर घर नहीं जा पाएँगे,
मगर कुछ क्षणों का कोमल स्पर्श,
इन्हें सुकून ज़रूर देगा,
नश्वरता को आलिंगन में लेने के लिए,
स्वैच्छा से, मधुरता से,
मिट्टी में विलीन होना भी आवश्यक है,
इस काल चक्र के संचालन के लिए,
फिर उजागर होने के लिए,
किसी और रूप में,
कोई और अस्तित्व लिए,
मगर सिर्फ़  प्रेम से,
जन्म से मरण तक,
फिर जन्म लेने के लिए |

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अवशेष

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अवशेष

एक अस्तित्व था,
जिसका
आकार भी,
रूप भी,
छवि भी,
औचित्य भी,
जो
काल बध्य होकर,
पूर्ण था,
मगर
क्षण क्षण घटता गया,
उसका आकार,
उसका रूप भी,
उसकी छवि,
उसका औचित्य भी,
और आज जो प्रत्यक्ष है,
वो सिर्फ़ अवशेष हैं,
अधूरी कहानी से,
किसीके इतिहास के,
जो सिर्फ़ तर्क वितर्क,
और अनुमान के दायरे में,
सीमित रहकर,
एक शोध का विषय बन जाएँगे,
मगर
क्या कभी भी,
इस अवशेष का,
सत्य हम जान पाएँगे?

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वक़्त

वक़्त पानी सा बहता गया,
जीवन की नाव चलती गयी,
कई छोर छूटते गए,
किनारे भी धुंदले होते गए,
और अब ये मंज़र है,
कि गहराई रास आने लगी है,
अब ना किसी छोर की तमन्ना,
ना ही किसी किनारे की आस बची है |

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जीवंत

इस अंतारंग के संताप को,इस कदर घोला तुमने,अपने महासागर रुपी प्रेम में,जैसे घुलती हो ये जमी उंगलियाँ,इन ऊन के धागों से बुने दस्तानों में,जो सौम्य सा सौहार्द देते हैं,दिसंबर की ठिठुरती ठंड में |और यूँ बेपरवाह सी जीती हूँ मैं अब,ना सूरज के उगने की चिंता होती है,ना ही कलियों के खिलने की चाह |
अब तो आभास होता है,एक क्रान्ति सा परिवर्तन का,इस अंतर्मन में,जिसे सदियों से जकड़ रखा था,कई दानावों ने,जो कुचलते रहे सोच को,छीनते रहे शान्ति,औरमेरे काल्पनिक उल्लास को भी |आज,आखिरकर,मैं उन्मुक्त हूँ,निरंकुश और श्वसन,हाँ!आख़िरकार,मैं सही मायने में जीवंत हूँ |

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सड़क

रोज़ गुज़रते हैं यहाँ से,

भोर के ख़ुशनुमा ख़्वाब कई ,

दोपहर की उजली उजली सी ये उमंग,

साँझ की अचल निराशा,

और रजनी का गहरा चिंतन भी |

हर उम्र यहाँ ठहरती है,

अपने अपने हिसाब से,

फलों की फेरी लगाता वो नौजवान,

करता उम्मीद दो रोटी की,

सुबह की बस का इंतज़ार करता,

वो छोटा सा बच्चा,

मिलने को उत्सुक अपने दोस्तों से,

साइकिल पर कॉलेज जाते,

दोस्त यार कई,

बेफ़िक्र दुनिया की परेशानियों से,

स्कूटर पर दफ़्तर जाते वो अंकल,

देने एक सुरक्षित जीवन,

अपने परिवार को,

यूँही पैदल चलती वो गृहणी,

हाथ में सब्ज़ी का थैला लिए,

गृहस्ती की ज़िम्मेदारी निभाती हुई,

लाठी संग हौले हौले चलती,

दादा नाना की ये टोली,

करने सैर और बात चीत |

कोई यहाँ उम्मीद छोड़ जाता है,

कोई थकान और शिकन,

कोई यहाँ आने वाले वक़्त की ख्वाहिशें,

कोई बीते हुए पलों की रंजिशे |

कभी यहाँ जश्न होता है,

कभी शोक और मौन भी,

कभी यहाँ काफिले निकलते हैं,

कभी सुनसान आहटें भी,

कभी यहाँ खिलती हैं मुस्कान,

कभी झड़ती मुरझाए साँसें भी,

सब कुछ यहीं होता है,

हर रोज़, हर पल,

यूँही ये सड़क बन जाती है,

एक अहम् हिस्सा,

सबके जीवन का |

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आग

एक धुआँ आतिश का,
एक सलील का,
एक सौहर्द देता,
एक ज़ख्म,
एक प्रेमाग्नि जैसा,
एक क्रोध की ज्वाला,
दोनों ही इस हृदय की उत्पत्ति हैं |

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दर्शन

अज्ञानता भावहीन है,
ज्ञात होना भावपूर्ण,
प्रथम हैं इस श्रेणी में,
भाव शंका के, भय के,
एवं आश्चर्य के |
बढ़ती तृष्णा भी है,
और असमंजस भी |
अगर असमंजस विजयी हुई,
तो भय प्रबल होता जाएगा,
अगर तृष्णा विजयी हो जाए,
तो फिर ये भाव परिवर्तित होते हैं,
स्पष्टता में, निर्भीकता में,
और धीरे धीरे व्यक्ति,
संभाव की स्तिथि तक पहुँच जाता है,
ये सफ़र ज्ञात से बोध का है |