दर्शन, philosophy, poetry

स्वीकृति

तालिका की सतह पर,ये हल्की गहरी रेखाएँ,कोई लम्बी, कोई छोटी,कोई पतली,कोई मोटी,कहीँ कटी,कहीँ रुकी,कहीँ बँधी,कहीँ खुली,कहीँ उठी,कहीँ झुकी,कहीँ दौड़ती,कहीँ लहराती,कहीँ मिलती,कहीँ जुदा होती,कहीँ चिन्ह हैँ,कहीँ दाग़ हैँ,कुछ मिटा सा है,कुछ छुपा सा है,कुछ बदलता है,कुछ स्थायी है,ना जाने क्या राज़ है इनमें,ना जाने क्या खुलासे हैँ,ना जाने क्या बातें हैँ,ना जाने क्या किस्से हैँ |जो भी है,वो यहीं है,इन्हीं रेखाओं में,भूत,वर्तमान, और भविश्य भी,काल,और पल भी,सम्पूर्ण,और अधूरा भी |ये स्वीकृति है,इस भाग्य की,कर्म की,और कारण की,प्रत्यक्ष के प्रमाण है,तर्क के विज्ञान है,विश्वास की,शंका की,उम्मीद की,हताशा की,वेदना की,संवेदना की,लाभ की,हानि की,स्मृति की,कल्पना की,इस जीवन के-क्षणभंगूर रूप की,स्वीकृति है |

दर्शन

चोट

वो कहते रहे –

” तुम कुछ काम के नहीं,

ना हो ख़ास, ना होगा तुम्हारा नाम कहीँ,

अपनी इन हसरतों पे लगाओ लगाम सही,

ना करदे ये तुम्हें बदनाम कहीँ,

होता है अगम्य ख्वाबों का अंजाम यही | “

शब्दों की इस नकारात्मकता ने –

हमको हर दिन सताया,

रातों का भी चैन गवाया,

ना अब नीन्द थी, ना ही सपनें,

यूँही लेटे रेहते थे इस बिस्तर पे तड़पने,

सुबह भी अब फ़ीकी फ़ीकी सी लगने लगी,

शाम आते आते उम्मीद की लौ भी बुझने लगी |

ऐसा लगता था –

जैसे कोई खिला फूल भी महकना भूल गया हो,

जैसे कोई नन्हा बच्चा भी चहकना भूल गया हो |

उमंग भरी आँखों का ये तेज,

गहरे काले घेरों में ओझल होने लगा,

ऊर्जा भरे अस्तित्व का ओजस भी,

देह के इन टूटी दरारों में मद्दीम होने लगा |

बस यूँही गूँजती रही वो बातें,

और हर पल लगता रहा येही,

मानों जैसे वो ना होकर भी यहाँ,

हर पल हमें बस यूँही बद्दुआ देते रहे |

चोट : अस्तित्व : आरोप