दर्शन, inspiration, philosophy

प्रकृति का रंगमच

© tulip_brook

शाम का ये मलमली पर्दा,

बैंगनी गुलाबी रंग लिए,

धीरे धीरे हटने लगा है,

क्यूँकि वक़्त आ गया है,

रात के अद्भुत नाट्य का |

किरदार भी दिखने लगे अब,

कुछ धुँदले से,अधूरे से,

तैयार खड़े इंतज़ार में,

अपने अभिनय प्रदर्शन के लिए |

चाँद हया में छिपा हुआ है,

बदली की ओढ़नी लिए,

कुछ सितारे ओझल से हैं,

नज़र आएँगे कुछ देर बाद,

जब और गहरा होगा ये रंगमच,

और यूँही चलेगा रात भर,

रास इन चाँद सितारों का,

श्वेत श्याम के संगम का,

और

फिर से गिरेगा ये पर्दा,

भोर की मधुर बेला में,

वही बैंगनी गुलाबी रंग लिए |

रंगमच : पर्दा : प्रकृति

poetry

ये चाँदनी – एक नज़्म

नूर की ख़्वाहिश किसे नहीं होती | हमें भी है – एक नज़्म इसी ख़्वाहिश के नाम |


उधर नूर उस मेहताब का, 

छुपाता बदली का ये नक़ाब, 

इधर दीदार की तलबगारी में, 

रश्क़ करता ये मन,

 नज़रों में ही बुन लेता ख़्वाब, 

इसी चाह में, 

कि मिल जाए  कुछ राहत, 

इस दिल-ए-बेकरारी को |
“कुछ सुकून तुम रख लो, 

कुछ हमें बक्श दो, “

कहता हुआ ये मन, 

दम भरता धीमें धीमें, 

जब झिलमिल आँखें मूँद लेता, 

तभी फ़िज़ा की एक शरारत, 

मुकम्मल कर देती उस ख़्वाहिश को |

और, 

उस माहेरु की एक झलक पाकर,  

ये महदूद भी बेशुमार हो जाता |

©प्रदीप्ति 

नूर: माहेरु: ख़्वाहिश