philosophy

इंदुकला

इंदुकला

ये मन ही तो है-
शीतल भी,
उग्र भी,
कभी शाँत,
कभी चँचल,
ठहराव लिए कभी,
कभी गतिशील भी,
कभी उदासीन,
कभी उल्हास पूर्ण,
कुछ वक़्त छिपा हुआ,
अपने ही ख्यालों में,
ढूंढ़ता हुआ उत्तर,
अनकहे सवालों के,
तिमिर में शोध करता हुआ-
अस्तित्व की,
व्यक्तित्व की,
सत्य की,
मिथ्या की,
प्रत्यक्ष की,
परोक्ष की,
हर भाव की,
भावहीनता की,
शून्यता का आभास,
करते हुए |
फिर धीरे धीरे,
उभरने के लिए,
एक नूतन प्रकाश लिए,
हर सवाल के उत्तर के साथ,
पूर्णता को उजागर करते हुए |
मगर ये मन
काल चक्र से बद्ध है
वो यूँही चरणों में जिएगा,
शून्य से पूर्ण तक,
पूर्ण से फिर शून्य तक,
हर चरण में एक छवि लिए,
इंदुकला की तरह |

प्रदीप्ति

Image source – internet

#tulipbrook #hindipoetry #spirituality #existence #philosophy

philosophy, poetry

नीर

नीर समझकर हमें जिन्होंने,
सिर्फ़ एक अनुयायी के रूप में ही देखा,
और ये ही अपेक्षा करते रहे,
कि ये तो नीर है,
जैसा भी दायरे दोगे,
ये उस दायरे में समा जाएगा |
वो ये नहीं समझ पाए कभी,
कि समायोजन करके इसका,
अनुनेय व्यक्तित्व वाला नीर भी,
एक हद्द के बाद,
हर सीमा,
हर दायरे को पार कर,
सिर्फ़ एक ही काम करता है,
सैलाब लेकर आता है |

पटरा कर देना ज़माने का काम था,
हमने तो सिर्फ़ अपना जलवा दिखा दिया |

philosophy

बाज़ार

संसार के इस बाज़ार में,
लिए खड़े हैं तराज़ू सब,
हर रिश्ते का वज़न,
तुलता है जहाँ हर रोज़,
अपेक्षाओं और ज़िम्मेदारियों के पलड़े में,
बिकता है वक़्त,
कीमत होती हर जज़्बात की,
रत्ती रत्ती हो जाता है मिलना मुश्किल,
और
खोने को होते हैं हिस्से हज़ार |
उसी बाज़ार के एक कोने में,
बिना तराज़ू खड़ा है,
इंसानियत का रिश्ता हथेली में लिए,
हर वो बच्चा अनाथ,
जिसे ना कुछ मिलने की है लालसा,
और
ना ही कुछ खोने की बेबसी |
ये दर्जा है इन्सानियत का,
इस संसार के बाज़ार में,
कोई जगह ही नहीं इसकी |

बाज़ार : तराज़ू : रिश्ते

Musings, Soulful

Nature

Nature is never problematic.
It acts in its most harmonious way.
It takes its own course with time.
Its the humans who are problematic-
problem for each other,
problem for other creatures,
and
problem for nature too.
Hastiness, greed, and a sense of false pride makes humans the most problematic of all creatures existing on this planet.

NATURE : HUMANS : COEXISTENCE

Musings

Marriage

The sanctity of the connubial thread lies in evolving through disagreements, through uncomfortable confrontations, through low times, through fears and weaknesses.
It’s about being each others’ mirror.
It’s about helping and supporting each other no matter what.
It’s about the willingness to give.
It’s about the deep desire to nurture each other and bring out the best in each other.
The process might look like a complicated mesh such as an embroidery backside.
But the outcome is a beautiful masterpiece of your relationship.
The one you created together over time.
It’s all about to what extent two people are ready to create this masterpiece.

MARRIAGE : COMMUNICATE : GROW

Spiritual

Religion

” Jaki rahi bhavna jaisi
Prabhu murat dekhi tin taisi”

  • Tulsidas

Different expressions of the one divine source.
Paths are different,
Destination is the same.
Therefore, so many gods in hinduism.
Therefore so many rituals, festivals, mantras
But a truly spiritual person will go beyond all this.
He will move towards experiencing shunyata-
A state of nothingness
(The essence of one’s existence).

GOD : RELIGION : FAITH

Uncategorized

Love and Relationships

Roses n thorns (my garden)

We all have pricking thorns all over our soft fragrant selves.
Love is about removing those thorns one by one.
Getting hurt and bruised too in the process.
But trying to fill in the soft self with deep love, and care and healing it fully.
It doesn’t happen overnight.
It takes time,

patience and effort.
That’s where people lose the track-
Thinking thorns as the only reality, not the true soft fragrant self.

Even if you pick up those thorns, you will find the rarest essence of the soft self in it and you will take that pain as a reward of building a very strong love in time to come.
Only if you are willing to go that far and deep.
No love is all sweetness n

And softness.
It sharply tears you from within.
And shakes your inner core deeply,
Like a sky- shattering and blinding lightning thunder.
Unless you understand that deep pain,
You wont understand what true love is.

LOVE : FRAGRANCE : THORNS

दर्शन, philosophy, poetry

मुखौटे

ना जाने कितने ही चेहरे,
ना जाने कितनी ही पहचान हैं,
इस दुनिया के रंगमंच पर,
ना जाने हर किरदार,
पहनता है कितने ही मुखौटे |
कभी मुखौटा लहराती ख़ुशी का,
भीतर अपने ग़म का सागर लिए,
कभी मुखौटा ग़म के बादल का,
बिन अश्कों की बारिश लिए,
उसी मुखौटे से –
किसीके सामने हँसता है,
किसीके सामने रोता है,
किसीसे मुँह फेरता है,
किसीकी ओर ताँकता है,
कभी आक्रोश में भी ख़ामोशी लिए,
कभी प्रेम में अविरल बोलता हुआ,
कभी निराशा में कोरे लब लिए,
कभी उम्मीद में जगमगाती मुस्कान लिए |
हर इंसान पहनता मुखौटे हज़ार,
कुछ बदलते हैं पल पल,
तो कुछ उम्र भर भी नहीं,
कुछ अपनों के लिए,
तो कुछ होते गैरों के लिए,
कुछ सिर्फ़ एक सच के लिए,
तो कुछ हर तरह के झूठ के लिए |

Soulful, Sufi

दूरी – नज़दीकी

वो

फ़लक –
जो कभी हासिल ना हो सका,
मगर ख्वाहिशों की फ़ेहरिस्त में,
सबसे आगे रहा हमेशा |

और ये ज़मीन –
जो हमेशा हमारी ही रही,
मगर हमारे साथ के लिए,
रज़ा मंदी का इंतज़ार करती रही |

इंसान को हमेशा,
कद्र और फ़िक्र,
नाक़ाबिल – ए – रसाई तोर प्यार की ही होती है |

inspiration, philosophy, poetry

इतिहास

इतिहास ये –
गेरुआ सा,
धुँधला सा,
घटता हुआ |
ईमारतें टूटी फूटी सी,
दीवारें भी दरारों भरी,
धरोहर फिर भी मज़बूत,
स्तम्भ ये अडिग खड़े हुए \
पत्थरों पर जमी वक़्त की काई,
ज़मीन पर पनपती प्रकृति,
ये संतुलित सा आकार,
ना अब तक बंजर हुआ,
ना ही बसेरा बना |
प्रदीप्ति